राज किशोर सिंह कुशवाहा, जिन्हें व्यापक रूप से 'बिहार के एप्पल मैन' के नाम से जाना जाता है, ने कृषि क्षेत्र में एक अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने मुजफ्फरपुर जिले के मुशहरी प्रखंड स्थित नरौली गांव में सेब की सफलतापूर्वक खेती करके पारंपरिक कृषि प्रतिमान को चुनौती दी है। उनकी यह सफलता ऐसे समय में आई है जब बिहार की कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था नकदी फसलों और वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से विविधीकरण की सख्त तलाश में है।
भारत के पारंपरिक सेब उत्पादन परिदृश्य का विहंगावलोकन
भारत में सेब की खेती सदियों से जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश की पहचान रही है 1। ये क्षेत्र सेब उत्पादन के लिए आदर्श माने जाते हैं क्योंकि यहाँ की ठंडी आबोहवा और उच्च ऊंचाई, सेब की वाणिज्यिक किस्मों के लिए आवश्यक 'चिलिंग आवर्स' (एक निश्चित अवधि तक कम तापमान) प्रदान करती है। इस पृष्ठभूमि में, बिहार जैसे राज्य, जो लीची उत्पादन के लिए मशहूर मुजफ्फरपुर जैसे क्षेत्रों में ग्रीष्मकाल में 40 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान अनुभव करते हैं, सेब की खेती के लिए अयोग्य माने जाते थे 1। इस प्रतिकूल जलवायु में सेब उगाना एक असंभव विचार था।
राज किशोर सिंह कुशवाहा: 'एप्पल मैन' की पहचान और मुजफ्फरपुर का महत्व
राज किशोर सिंह कुशवाहा ने अपनी लगन और नवाचार के बल पर इस भौगोलिक सीमा को तोड़ दिया। मुजफ्फरपुर की धरती पर सेब उगाकर उन्होंने न केवल स्थानीय किसानों को एक नई दिशा दी, बल्कि उन्हें पूरे बिहार में 'एप्पल मैन' के रूप में प्रसिद्ध कर दिया। वर्तमान में, उनके नरौली गांव के खेत में सेब के 250 पेड़ फलों से लहलहा रहे हैं, जो उनकी सफलता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
पृष्ठभूमि और नवाचार की आवश्यकता
झारखंड के अलग होने के बाद, बिहार की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कृषि पर निर्भर हो गई। हालांकि, महंगी बिजली, पानी, खाद और खेतिहर मजदूरों की कमी के कारण धान, गेहूं, और मक्का जैसी परंपरागत खेती करना किसानों के लिए उतना लाभकारी नहीं रहा। इस आर्थिक दबाव और सीमित लाभ की स्थिति ने राज किशोर कुशवाहा जैसे प्रगतिशील किसानों को वैज्ञानिक तकनीकें और नकदी फसलें अपनाने के लिए प्रेरित किया। उनकी सेब की खेती इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण है कि किस तरह कृषि-उद्यमिता, परंपरागत खेती की सीमाओं को तोड़कर, किसानों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बना सकती है।
प्रेरणा का स्रोत और प्रारंभिक संघर्ष
राज किशोर सिंह की नवाचार यात्रा की शुरुआत स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद हुई। राजस्थान की यात्रा के दौरान सीकर जिले में एक किसान के सेब बागान को देखकर उन्हें गर्म जलवायु में सेब उगाने की प्रेरणा मिली। इस प्रेरणा के साथ, उन्होंने 2018 में हिमाचल प्रदेश से सेब के 50 पौधे लाकर अपनी 12 कट्ठा (लगभग 0.25 एकड़) जमीन पर लगाए।
दुर्भाग्य से, अनुभव की कमी के कारण, दो साल के भीतर उनके लगाए गए लगभग सभी पौधे सूख गए। यह असफलता उनके लिए एक सीखने का मौका साबित हुई। उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी गलती को सुधारा। उन्होंने हिमाचल प्रदेश और कश्मीर के सफल सेब किसानों से विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त किया 1। यह प्रशिक्षण एक निर्णायक मोड़ था, जिसने उन्हें यह समझने में मदद की कि पारंपरिक किस्में काम नहीं करेंगी और विशिष्ट लो-चिलिंग किस्मों तथा जलवायु-उपयुक्त प्रूनिंग तकनीकों की आवश्यकता है।
गर्म जलवायु के लिए अनुकूल सेब की किस्में
राज किशोर की सफलता का तकनीकी आधार उन विशिष्ट सेब की किस्मों के चयन में निहित है जिन्हें कम या शून्य 'चिलिंग आवर्स' की आवश्यकता होती है। कृषि वैज्ञानिकों ने पुष्टि की है कि ये किस्में 40 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी सफलतापूर्वक फल दे सकती हैं।
HRMN-99 का महत्व
सर्वाधिक महत्वपूर्ण किस्म HRMN-99 है। यह किस्म हिमाचल प्रदेश के हरिमन शर्मा द्वारा विकसित एक स्व-परागित, लो-चिलिंग किस्म है, जिन्हें इसके लिए पद्म श्री से सम्मानित किया गया। HRMN-99 40-45°C तक के उच्च तापमान में भी फलने-फूलने की क्षमता रखती है, जिससे यह उपोष्णकटिबंधीय और मैदानी क्षेत्रों में सेब की खेती के लिए क्रांतिकारी बन गई है। इस किस्म में फूल जनवरी से मार्च तक आते हैं, और फलों की कटाई आमतौर पर जून के अंत तक की जा सकती है। अन्य अनुकूल किस्में वैज्ञानिकों ने HRMN-99 के अलावा अन्ना और डोरसेट गोल्डन प्रजातियों को भी गर्म प्रदेशों के लिए अनुकूल पाया है। ये सभी किस्में मिलकर राज किशोर के मॉडल को एक मजबूत तकनीकी आधार प्रदान करती हैं। यह समझना महत्वपूर्ण है कि राज किशोर की सफलता केवल उनकी मेहनत का परिणाम नहीं है, बल्कि यह HRMN-99 जैसी विशिष्ट कम-शीतलक किस्मों की तकनीकी श्रेष्ठता पर निर्भर एक मॉडल है। यदि यह तकनीकी नवाचार (आनुवंशिक प्रतिरोधक क्षमता) उपलब्ध नहीं होता, तो बिहार की जलवायु में सेब उगाना असंभव रहता।
कम-शीतलक सेब किस्मों के बागवानी मापदंड
कुशवाहा मॉडल की विशिष्ट कृषि पद्धतियाँ
राज किशोर सिंह कुशवाहा ने अपनी खेती में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया है। जैविक और उन्नत तकनीकें: वह जैविक तरीके से सेब की खेती कर रहे हैं। जैविक खेती न केवल उत्पादन लागत को नियंत्रित रखती है बल्कि बिहार जैसे कृषि-सघन राज्य के लिए एक टिकाऊ, पर्यावरण-अनुकूल मार्ग भी प्रदान करती है। कीट प्रबंधन के लिए, वह रासायनिक कीटनाशकों के बजाय फेरोमोन ट्रैप जैसी जैविक विधियों का उपयोग करते हैं। ये ट्रैप उन कीटों को नियंत्रित करते हैं जो फल या पौधे को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
बागान प्रबंधन: उनके बागान में वर्तमान में 250 पेड़ हैं। राज किशोर के अनुसार, एक एकड़ खेत में लगभग 435 पौधे लगाए जा सकते हैं, जो उच्च घनत्व रोपण को इंगित करता है। उचित देखभाल और वैज्ञानिक प्रबंधन के कारण, उनके पौधे सफलतापूर्वक फल दे रहे हैं।
आर्थिक विश्लेषण और सफलता का मॉडल
राज किशोर सिंह कुशवाहा का सफलता मॉडल दो प्रमुख राजस्व धाराओं पर आधारित है: फल उत्पादन और नर्सरी व्यवसाय। यह विविधीकृत दृष्टिकोण उनके उद्यम को वित्तीय स्थिरता प्रदान करता है।
उत्पादन और उपज क्षमता का मूल्यांकन
उनकी खेती की प्रारंभिक सफलता उत्साहजनक रही है। दो साल के छोटे पौधों में भी प्रति पौधा 2 किलोग्राम से 5 किलोग्राम तक फल लगे हैं। परिपक्व उपज की क्षमता राज किशोर का दावा है कि उचित देखभाल के साथ, उन्नत किस्म के पौधे तीसरे साल से प्रति पौधा एक क्विंटल (100 किलोग्राम) तक सेब की उपज दे सकते हैं। अन्य रिपोर्टों में यह भी उल्लेख है कि बड़े होने पर एक पेड़ से 50 से 100 किलोग्राम तक सेब तोड़ा जा सकता है। यदि ये उपज क्षमताएं बड़े पैमाने पर प्राप्त होती हैं, तो यह पारंपरिक फसलों की तुलना में कई गुना अधिक आय प्रदान करेंगी।
राजकिशोर का दोहरी आय मॉडल
फल उत्पादन से राजस्व राजकिशोर दावा करते हैं कि दस कट्ठा (लगभग 0.25 एकड़) जमीन में सेब की खेती से ₹10 लाख रुपए की आमदनी की जा सकती है। यह दावा दर्शाता है कि सेब की खेती बिहार में नकदी फसल के रूप में एक बहुत ही उच्च आय क्षमता रखती है, जो किसानों के लिए मजबूत आर्थिक प्रोत्साहन प्रदान करती है। नर्सरी व्यवसाय से स्थिर आय उनकी सफलता से प्रेरित होकर, किसानों की मांग बढ़ने लगी, जिसके जवाब में राज किशोर ने अपनी सेब की नर्सरी शुरू की। उनकी नर्सरी में करीब 5,000 पौधे हैं, और सिर्फ सेब के पौधे बेचकर ही वह प्रति वर्ष लगभग ₹2 लाख कमाते हैं। यह दोहरी आय रणनीति उनके मॉडल को स्थिरता प्रदान करती है। फल उत्पादन बाजार और मौसम पर निर्भर करता है, लेकिन नर्सरी व्यवसाय, जिसमें वह बिहार और दक्षिण भारत के कई राज्यों के किसानों को पौधे बेचते हैं, एक गैर-मौसमी, स्थिर आय स्रोत है। यह दर्शाता है कि राज किशोर का वास्तविक सफलता मॉडल सिर्फ उत्पादक बनने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह क्षेत्र में ज्ञान और सामग्री का एक महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता (Agri-Entrepreneur) भी बन गए हैं।
कुशवाहा मॉडल के आर्थिक अनुमान (प्रति इकाई)
बाजार चुनौतियाँ और गुणवत्ता का मूल्यांकन
वाणिज्यिक सफलता के रास्ते में कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियाँ मौजूद हैं, जिन पर कृषि वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं का ध्यान केंद्रित होना चाहिए। गुणवत्ता और रंग का मुद्दा: गर्म प्रदेशों में उगाए जाने वाले सेबों का एक प्रमुख मुद्दा उनका रंग है। ये सेब अक्सर हरे रंग के होते हैं। पारंपरिक भारतीय बाजार में लाल रंग के कश्मीरी या हिमाचली सेबों की उच्च स्वीकार्यता को देखते हुए, इन हरे सेबों की बाजार में कीमत और मांग का मूल्यांकन अभी बाकी है। कृषि वैज्ञानिकों द्वारा वर्तमान में फल की गुणवत्ता, मिठास और उत्पादन क्षमता के मानकों का परीक्षण किया जा रहा है।
लॉजिस्टिक्स और शेल्फ लाइफ की चुनौती: HRMN-99 किस्म का एक महत्वपूर्ण दोष इसकी सीमित शेल्फ लाइफ (कमरे के तापमान पर लगभग 10-12 दिन) है। यह वाणिज्यिक उत्पादन के लिए एक गंभीर लॉजिस्टिक्स बाधा प्रस्तुत करता है। यदि बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू होता है, तो लंबी दूरी के परिवहन और बाजार तक पहुँचने के लिए कोल्ड स्टोरेज और कुशल कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर की तत्काल आवश्यकता होगी। यदि यह ढांचा उपलब्ध नहीं हुआ, तो उच्च उपज भी वाणिज्यिक विफलता का कारण बन सकती है। इसलिए, सरकारी और वैज्ञानिक समर्थन अब केवल 'उत्पादन बढ़ाने' पर नहीं, बल्कि 'उत्पाद गुणवत्ता सुधार' और 'पोस्ट-हार्वेस्ट प्रबंधन' पर केंद्रित होना चाहिए।
राज किशोर कुशवाहा का अन्य किसानों पर व्यापक प्रभाव
राज किशोर सिंह कुशवाहा की सफलता ने उन्हें पूरे क्षेत्र में एक प्रेरणास्रोत बना दिया है। उनकी नर्सरी से ज्ञान और पौधे दोनों का प्रसार हो रहा है। राज्यव्यापी प्रेरणा और ज्ञान प्रसार: उनकी सफलता से प्रेरित होकर, पूर्णिया (राजेंद्र प्रसाद साह, खुर्शीद आलम), कटिहार (मंजीत मंडल), औरंगाबाद (श्रीकांत सिंह) समेत राज्य के कई जिलों के किसानों ने भी सेब की खेती में रुचि दिखाई है और उत्पादन शुरू किया है। राजेंद्र प्रसाद साह जैसे किसानों को कृषि विभाग से 90% अनुदान पर ड्रिप सिंचाई पद्धति का भी लाभ मिला है, जिससे यह मॉडल अन्य क्षेत्रों में फैल रहा है। राज किशोर की नर्सरी से केवल बिहार ही नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के कई राज्यों के किसानों ने भी पौधे मंगाए हैं। यह तथ्य उनके नवाचार की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता और उपयोगिता को दर्शाता है।
सरकारी प्रोत्साहन और विशेष उद्यानिकी फसल योजना
राज किशोर जैसे किसानों की सफलतम खेती ने राज्य सरकार का ध्यान आकर्षित किया, जिसके परिणामस्वरूप कृषि नीति में बदलाव हुआ। सरकार ने अब सेब की खेती को बढ़ावा देने के लिए औपचारिक प्रयास शुरू कर दिए हैं।
पायलट प्रोजेक्ट: उद्यान विभाग ने 'विशेष उद्यानिकी फसल योजना' के तहत सेब की खेती का विस्तार करने के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है।
- चयनित जिले: पायलट प्रोजेक्ट के लिए सात जिलों का चयन किया गया है, जिनमें मुजफ्फरपुर, वैशाली, समस्तीपुर, बेगूसराय, कटिहार, औरंगाबाद और भागलपुर शामिल हैं।
- फोकस किस्म: इस परियोजना में मुख्य रूप से HRMN-99 किस्म पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जिसे उपोष्णकटिबंधीय मैदानी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त माना जाता है।
- प्रारंभिक चरण: शुरुआती चरण में, इन सभी जिलों में 10 हेक्टेयर भूमि पर वृक्षारोपण की योजना थी।
राज किशोर की सफलता ने राज्य नीति को निर्देशित किया है। सरकार का सब्सिडी देना और पायलट प्रोजेक्ट शुरू करना (₹1.23 लाख/हेक्टेयर) यह दर्शाता है कि निजी नवाचार ने संस्थागत परिवर्तन को प्रेरित किया है, जिससे यह मॉडल सरकारी जोखिम को कम करते हुए व्यापक रूप से अपनाया जा रहा है।
बिहार सरकार का सेब की खेती के लिए सब्सिडी ढांचा
सब्सिडी संरचना का गहन विश्लेषण
बिहार सरकार ने प्रति हेक्टेयर इकाई लागत ₹2,46,250 निर्धारित की है, जिस पर किसानों को 50% अनुदान प्रदान किया जा रहा है। इस सब्सिडी के तहत अधिकतम ₹1,23,125 की वित्तीय सहायता दी जाती है। पायलट प्रोजेक्ट के लिए 7 जिलों का चयन यह संकेत देता है कि सरकार सेब की खेती को केवल मुजफ्फरपुर तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि इसे राज्य के कृषि विविधीकरण और उच्च-मूल्य वाली नकदी फसल कार्यक्रम के रूप में देखती है। यह कदम किसानों को बाढ़ और सूखे जैसी पारंपरिक कृषि चुनौतियों से निपटने और उनकी आय स्थिर करने में मदद करेगा।
कृषि वैज्ञानिक व संस्थानों की भूमिका
कृषि वैज्ञानिक इस परियोजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने वैज्ञानिक रूप से पुष्टि की है कि HRMN-99 जैसी किस्में बिहार की जलवायु के अनुकूल हैं । वैज्ञानिक अब निरंतर अनुसंधान कर रहे हैं ताकि फलों की गुणवत्ता, विशेष रूप से रंग, मिठास, और शेल्फ लाइफ में सुधार किया जा सके, जिससे बिहार के सेब बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकें।
बिहार में सेब क्रांति का सारांश
राज किशोर सिंह कुशवाहा, 'एप्पल मैन ऑफ बिहार,' की कहानी उपोष्णकटिबंधीय भारत में जलवायु-अनुकूल बागवानी नवाचार का एक उत्कृष्ट मॉडल है। हिमाचल प्रदेश के ठंडे मौसम की फसल को बिहार के गर्म मैदानों में सफलतापूर्वक उगाना, HRMN-99 जैसी विशिष्ट किस्मों की तकनीकी श्रेष्ठता और राज किशोर की उद्यमशीलता का प्रमाण है। उनकी दोहरी आय रणनीति (फल उत्पादन और नर्सरी व्यवसाय) ने व्यक्तिगत समृद्धि के साथ-साथ क्षेत्रीय कृषि विविधीकरण के लिए एक स्थायी और उच्च-लाभकारी मार्ग प्रदान किया है।
वर्तमान चुनौतियाँ और भविष्य के जोखिम
वाणिज्यिक सफलता को दीर्घकालिक रूप से सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित चुनौतियों का समाधान आवश्यक है:
- उत्पाद गुणवत्ता और बाजार स्वीकार्यता: गर्म क्षेत्रों में उगाए गए सेबों का हरा रंग उपभोक्ताओं द्वारा उच्च गुणवत्ता वाले लाल सेबों की तुलना में कम स्वीकार्य हो सकता है। भविष्य में, बाजार में प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए फल के रंग और मिठास में सुधार हेतु निरंतर आनुवंशिक या बागवानी अनुसंधान (जैसे कैनोपी प्रबंधन) की आवश्यकता होगी।
- लॉजिस्टिक्स की कमी: HRMN-99 की छोटी शेल्फ लाइफ (10-12 दिन) बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए सबसे बड़ा जोखिम है। यदि शीत भंडारण और परिवहन के लिए मजबूत बुनियादी ढांचा विकसित नहीं किया गया, तो किसान अपनी उपज को जल्दी खराब होने से नहीं बचा पाएंगे और उन्हें कम कीमत पर बेचना पड़ सकता है।
- तकनीकी निर्भरता और विस्तार: यह मॉडल उन्नत तकनीकों (जैविक कीट प्रबंधन, ड्रिप सिंचाई) पर अत्यधिक निर्भर है। इन तकनीकों के ज्ञान और सामग्री का व्यापक प्रसार सुनिश्चित करना आवश्यक है।
नीति निर्माताओं और किसानों के लिए रणनीतिक सिफारिशें
इस नवाचार को टिकाऊ और व्यापक बनाने के लिए निम्नलिखित रणनीतिक कदम उठाने की सिफारिश की जाती है:
- शीत भंडारण बुनियादी ढांचे में निवेश: सरकार को पायलट प्रोजेक्ट क्षेत्रों में विकेन्द्रीकृत कोल्ड स्टोरेज इकाइयों की स्थापना को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। HRMN-99 की छोटी शेल्फ लाइफ को देखते हुए, कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए मानक 50% के बजाय 75%-90% तक की उच्च सब्सिडी प्रदान की जानी चाहिए।
- गुणवत्ता-केंद्रित विस्तार कार्यक्रम: सब्सिडी और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को केवल क्षेत्र विस्तार तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) और गुणवत्ता नियंत्रण प्रथाओं को अपनाने वाले किसानों पर केंद्रित करना चाहिए, ताकि बाजार में स्वीकार्य सेबों का उत्पादन हो सके।
- ज्ञान नेटवर्क का औपचारिककरण: राज किशोर सिंह कुशवाहा जैसे सफल किसानों को राज्य-स्तरीय 'मास्टर ट्रेनर' या 'नवाचार सलाहकार' के रूप में औपचारिक मान्यता दी जानी चाहिए। उन्हें कृषि विभाग की विस्तार सेवाओं के साथ जोड़ा जाना चाहिए ताकि उनका जमीनी अनुभव और ज्ञान नए किसानों तक तेजी से और विश्वसनीय तरीके से पहुंच सके।
- वैज्ञानिक अनुसंधान फोकस: कृषि संस्थानों को फल की गुणवत्ता, खासकर रंग और शेल्फ लाइफ में सुधार के लिए रूटस्टॉक परीक्षण और आनुवंशिक संवर्धन पर अनुसंधान जारी रखना चाहिए।