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कृषि समाचार

किसान से उद्यमी बने, पर छिना राशन कार्ड: न्याय की मांग तेज

Raushan Kumar Raushan Kumar
Updated 23 September, 2025 8:30 PM IST
किसान से उद्यमी बने, पर छिना राशन कार्ड: न्याय की मांग तेज

देश भर में हजारों किसान उत्पादक कंपनियों प्रोड्यूसर के निदेशक एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहे हैं, उनके राशन कार्ड रद्द होने का खतरा मंडरा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) से अपात्र लाभार्थियों को बाहर करने के लिए चलाए जा रहे अभियान के बीच, प्रोड्यूसर के निदेशक, जो स्वयं किसान हैं, नियमों के एक ऐसे जाल में फंस गए हैं जो उनकी दोहरी पहचान, एक किसान और एक कंपनी निदेशक के बीच अंतर करने में विफल रहा है। यह स्थिति न केवल इन निदेशकों के परिवारों के लिए खाद्य सुरक्षा का संकट पैदा कर रही है, बल्कि देश में कृषि के सामूहिकीकरण और किसानों को उद्यमी बनाने के सरकारी प्रयासों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है।


संकट का मूल: कहाँ से शुरू हुई समस्या?

इस संकट की जड़ें केंद्र सरकार के उस निर्देश में हैं, जिसमें राज्यों को राशन कार्ड लाभार्थियों के डेटाबेस का सत्यापन करने के लिए कहा गया है। खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने विभिन्न सरकारी डेटाबेस, जैसे कि आयकर विभाग (CBDT), केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC), और कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) से प्राप्त आंकड़ों का मिलान PDS लाभार्थियों की सूची से किया है।


इस प्रक्रिया में, सरकार ने कई अपात्र लाभार्थियों की पहचान की है, जिनमें आयकर दाता, चार पहिया वाहन मालिक और कंपनी के निदेशक शामिल हैं। राज्यों को 30 सितंबर, 2025 तक ऐसे अपात्र पाए गए लोगों के नाम सूची से हटाने और उनके राशन कार्ड रद्द करने का निर्देश दिया गया है।


यहीं पर किसान उत्पादक कंपनियों के निदेशक अनजाने में इस नियम की चपेट में आ गए हैं। चूंकि प्रोड्यूसर कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत पंजीकृत होती हैं, उनके निदेशक भी कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के रिकॉर्ड में कंपनी निदेशक के रूप में दर्ज होते हैं। परिणामस्वरूप, देश के कई राज्यों में, प्रोड्यूसर निदेशकों को स्थानीय खाद्य आपूर्ति अधिकारियों से नोटिस मिलने शुरू हो गए हैं, जिसमें उनसे यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि कंपनी निदेशक होने के नाते उनका राशन कार्ड क्यों न रद्द कर दिया जाए।


प्रोड्यूसर निदेशक: किसान या उद्यमी? या दोनों?

किसान उत्पादक कंपनी मॉडल को किसानों, विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों की आय बढ़ाने और उनकी बाजार तक पहुंच को सुगम बनाने के एक प्रभावी साधन के रूप में बढ़ावा दिया गया है। प्रोड्यूसर में, सदस्य किसान ही शेयरधारक होते हैं और वे अपने में से ही निदेशकों का चुनाव करते हैं। ये निदेशक कंपनी के दिन-प्रतिदिन के कामकाज की देखरेख करते हैं, लेकिन वे मूल रूप से किसान ही रहते हैं और अपनी आजीविका के लिए खेती पर ही निर्भर रहते हैं।


अध्ययनों और जमीनी हकीकत से यह स्पष्ट है कि अधिकांश प्रोड्यूसर के निदेशक छोटे या सीमांत किसान हैं। वे निदेशक के रूप में कोई महत्वपूर्ण वेतन या भत्ता प्राप्त नहीं करते हैं। कंपनी का निदेशक बनना उनके लिए एक अतिरिक्त जिम्मेदारी है, जिसका उद्देश्य अपने साथी किसानों के सामूहिक हित को आगे बढ़ाना है। वे किसी बड़े कॉर्पोरेट घराने के निदेशकों की तरह नहीं हैं, जिनकी आय करोड़ों में होती है।


इस प्रकार, कंपनी निदेशक होने के एकल मानदंड के आधार पर उन्हें PDS के लाभों से वंचित करना, प्रोड्यूसर की मूल भावना और उन किसानों की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता की अनदेखी करना है जो इन्हें चलाते हैं।


सरकारी मंत्रालयों में मतभेद और किसानों की चिंता?

इस गंभीर स्थिति को भांपते हुए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने हस्तक्षेप किया है। हाल ही में, कृषि सचिव ने खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण सचिव को एक पत्र लिखकर इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त की है। पत्र में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि कई प्रोड्यूसर निदेशक डर के कारण अपने पद से इस्तीफा दे रहे हैं ताकि वे अपने परिवार का राशन कार्ड बचा सकें।


कृषि मंत्रालय ने आग्रह किया है कि प्रोड्यूसर निदेशकों की पात्रता का निर्धारण केवल इस आधार पर न किया जाए कि वे एक कंपनी के निदेशक हैं, बल्कि उनकी व्यक्तिगत सामाजिक-आर्थिक स्थिति, आय और भूमि जोत जैसे मानदंडों के आधार पर योग्यता के आधार पर किया जाना चाहिए। यह इस बात की स्पष्ट स्वीकृति है कि एक प्रोड्यूसर निदेशक को किसी अन्य निजी लिमिटेड कंपनी के निदेशक के बराबर नहीं रखा जा सकता है।


हालांकि, खाद्य मंत्रालय की ओर से अभी तक इस पर कोई स्पष्ट आधिकारिक निर्देश या परिपत्र जारी नहीं हुआ है, जिससे जमीनी स्तर पर भ्रम और अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है।


क्या कहते हैं किसान संगठन?

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विभिन्न किसान संगठनों ने सरकार के इस कदम की आलोचना की है। उनका तर्क है कि यह नीति एक आकार सभी के लिए उपयुक्त दृष्टिकोण का परिणाम है, जो प्रोड्यूसर की विशिष्ट संरचना को समझने में विफल रही है।


मुख्य तर्क और चिंताएं?


• किसानों का हतोत्साहन: यदि प्रोड्यूसर का निदेशक बनने से सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिलना बंद हो जाता है, तो कोई भी किसान यह जिम्मेदारी लेने से कतराएगा। यह प्रोड्यूसर आंदोलन को कमजोर करेगा।


• खाद्य सुरक्षा का खतरा: कई प्रोड्यूसर निदेशक वास्तव में गरीब हैं और अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए PDS पर बहुत अधिक निर्भर हैं। उनका राशन कार्ड रद्द होने से उनके परिवार भुखमरी की कगार पर आ सकते हैं।


• नीतिगत विरोधाभास: एक तरफ सरकार 10,000 प्रोड्यूसर के गठन और संवर्धन की योजना चला रही है, वहीं दूसरी तरफ ऐसी नीतियां बना रही है जो इन संस्थाओं के नेतृत्व को ही कमजोर कर रही हैं।


• राज्यों की भूमिका: चूँकि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के तहत लाभार्थियों की पहचान की अंतिम जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है, इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि राज्य इस मामले में विवेकपूर्ण और किसान-हितैषी दृष्टिकोण अपनाएं।


आगे की राह: क्या हो सकता है समाधान?

इस संकट का समाधान एक स्पष्ट और तर्कसंगत नीतिगत स्पष्टीकरण में निहित है। केंद्र सरकार, विशेष रूप से खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय को, कृषि मंत्रालय के सुझावों पर तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए।


• स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करना: खाद्य मंत्रालय को सभी राज्यों के खाद्य विभागों को एक स्पष्ट परिपत्र जारी करना चाहिए, जिसमें निर्देश दिया गया हो कि प्रोड्यूसर के निदेशकों को केवल उनके पद के कारण PDS से बाहर न किया जाए।


• पात्रता का व्यक्तिगत मूल्यांकन: प्रोड्यूसर निदेशकों की पात्रता का मूल्यांकन अन्य किसानों की तरह ही उनके परिवार की आय, भूमि जोत और अन्य निर्धारित मानदंडों के आधार पर किया जाना चाहिए।


• प्रोड्यूसर को विशेष श्रेणी: कंपनी अधिनियम के तहत प्रोड्यूसर की एक अलग पहचान को मान्यता देते हुए, उनके निदेशकों को राशन कार्ड के अपात्रता नियमों में छूट दी जानी चाहिए।


प्रोड्यूसर निदेशकों के राशन कार्ड पर आया यह संकट एक गंभीर नीतिगत चूक का परिणाम है। यह न केवल हजारों गरीब किसान परिवारों की खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि यह उस कृषि-उद्यमिता की भावना पर भी प्रहार है जिसे सरकार बढ़ावा देना चाहती है। यह आवश्यक है कि सरकार तत्काल इस विसंगति को दूर करे और यह सुनिश्चित करे कि जो किसान अपने साथी किसानों का नेतृत्व करने के लिए आगे आ रहे हैं, उन्हें दंडित होने के बजाय प्रोत्साहित किया जाए।

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