भाकृअनुप–राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर में “सतत लीची उत्पादन एवं मूल्य शृंखला प्रबंधन हेतु वैज्ञानिक नवाचार” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ मंगलवार, 4 फरवरी 2026 को हुआ। कार्यशाला का उद्देश्य लीची की सतत खेती को बढ़ावा देने के साथ-साथ उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन से जुड़ी मूल्य शृंखला को मजबूत करना है।
उद्घाटन सत्र की शुरुआत राष्ट्रीय गीत से हुई, जिसके बाद दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के. के. कुमार, पूर्व निदेशक, भाकृअनुप–राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र रहे। विशिष्ट अतिथियों में सुमन प्रभा (डीडीएम, नाबार्ड), रंजीत प्रताप पंडित (उपनिदेशक, बामेती, पटना), एस. डी. पांडे (पूर्व निदेशक), विशाल नाथ (पूर्व निदेशक, भाकृअनुप–राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर) तथा शैलेन्द्र राजन (पूर्व निदेशक, आईसीएआर–सीआईएसएच, लखनऊ) शामिल थे।
केंद्र के निदेशक बिकाश दास ने स्वागत भाषण में लीची के समग्र विकास, इसकी सांस्कृतिक महत्ता और फसल विविधीकरण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने मखाना जैसी अन्य विशिष्ट फसलों का उल्लेख करते हुए समन्वित कृषि दृष्टिकोण अपनाने पर बल दिया। आयोजन सचिव सुनील कुमार ने कार्यशाला की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए तकनीकी सत्रों और किसान सहभागिता की जानकारी दी।
नाबार्ड की डीडीएम सुमन प्रभा ने किसानों के बेहतर प्रबंधन और सहायता प्रणाली के लिए नाबार्ड द्वारा प्रायोजित “लीची सेवा केंद्र” की स्थापना को एक महत्वपूर्ण और नवाचारी पहल बताया। बामेती के उपनिदेशक रंजीत प्रताप पंडित ने संस्थान के सहयोग से संचालित प्रशिक्षण कार्यक्रमों की सराहना करते हुए कहा कि इससे किसानों को व्यावहारिक और ज्ञानवर्धक लाभ मिल रहा है।
पूर्व निदेशक विशाल नाथ ने किसान आय बढ़ाने के लिए लीची के मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण और वैज्ञानिक विपणन पर जोर दिया। एस. डी. पांडे ने व्यापक प्रभाव के लिए विभिन्न शोध एवं विकास संस्थानों के बीच समन्वय को अनिवार्य बताया। शैलेन्द्र राजन ने नए संभावित क्षेत्रों में लीची विस्तार की संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए मुजफ्फरपुर के किसानों से अपनी अग्रणी भूमिका बनाए रखने का आह्वान किया।
मुख्य अतिथि के. के. कुमार ने पद्मश्री से सम्मानित गोपाल जी त्रिवेदी के योगदान को याद करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन लीची उत्पादन के लिए एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है, जिसे देखते हुए नए कृषि-जलवायु अनुकूल क्षेत्रों की पहचान आवश्यक है।
कार्यशाला में बिहार के विभिन्न जिलों से आए लगभग 70 प्रगतिशील लीची किसानों ने भाग लिया। कार्यक्रम में केंद्र के वैज्ञानिक अभय कुमार, सुनील कुमार, प्रभात कुमार, अंकित कुमार, भाग्या विजयन, इपसिता साम्ल तथा प्रशासनिक अधिकारी शुभम सिन्हा और वित्त एवं लेखा अधिकारी कुशबाघला सहित केंद्र के सभी कर्मचारी उपस्थित रहे।